एक बड़ा सवाल…क्या भारत एक मजबूत ASEAN का नेतृत्व करने में सक्षम होगा ?

एक बड़ा सवाल...क्या भारत एक मजबूत ASEAN का नेतृत्व करने में सक्षम होगा ?

एक बड़ा सवाल…क्या भारत एक मजबूत ASEAN का नेतृत्व करने में सक्षम होगा ?

आपको बता दे की कुछ ही दिनों पहले दक्षिण पूर्वी देशों के गुट ASEAN का सिंगापुर में शिखर सम्मलेन हुआ. दक्षिण पूर्वी देशों और पूरे हिंद प्रशांत क्षेत्र पर चीन का बढ़ता प्रभाव इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है. ASEAN यानी दक्षिण पूर्वी देशों के समूह के ज्यादातर देश इस क्षेत्र में भारत को चीन की शक्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी समझते हैं.

भारत इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में एक बहुपक्षीय सैनिक गठबंधन बना कर चीन को नाखुश करने के पक्ष में नहीं है, फिर भी वो ASEAN देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को मजबूत कर रहा है जैसे वियतनाम, म्यांमार, इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया.

प्रधानमंत्री ने सिंगापुर में ASEAN के दौरान निवेश कारोबार और देशों के बीच कनेक्टिविटी पर फोकस किया, चीन ने भारत की एक्ट ईस्ट और चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में समन्वय बनाने की बात की. उन्होंने कहा कि इससे दोनों देशों को फायदा होगा लेकिन भारत चीन की OBOR परियोजना को स्वीकृति नहीं देता चाहता है. इसका कारण है वन बेल्ट वन रोड परियोजना के जरिए छोटे देशों पर अपना आधिपत्य जमाने की कोशिश.

पूरे इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में एक सामरिक भूस्खलन चल रहा है और चीन का उदय, उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना इस का अहम हिस्सा है. इन परिस्थितियों में भारत की अहमियत सामरिक, राजनीतिक दृष्टि से बढ़ती ही जा रही है. अमेरिका के लिए भी इस क्षेत्र में भारत की अहमियत बढ़ती गई है, उसके एशिया पिवट की नीति के तहत भी इंडो-पेसिफिक उसके लिए महत्वपूर्ण है, इतना कि अमेरिका ने कुछ समय पहले अपने पेसिफिक कमांड का नाम बदल कर इंडो-पेसिफिक कमांड कर दिया. ये सांकेतिक है, लेकिन अहम संकेत है.

भारत का पड़ोसी देश मालदीव हाल ही में चीन समर्थक अब्दुल्लाह यामीन के चंगुल से बाहर आया है. यामीन ने भारत के कई प्रोजेक्ट को दरकिनार कर दिया था जैसे मालदीव की सेना के लिए भारत की ट्रेनिंग अकादमी, एक एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन, काम करने मालदीव गए भारतीयों के वीसा में अड़ंगा और भारतीय प्राइवेट कंपनियों की पहल पर रोक.

नए राष्ट्रपति ने साफ किया है कि पिछले शासन में निर्माण क्षेत्र में चीन के उधार की वजह से मालदीव एक कर्ज जाल में फंस गया. मालदीव के खजाने खाली हैं. मालदीव में जांच की मांग चल रही है कि पछली सरकार में चीनी कंपनियों को किस तरह कॉन्ट्रैक्ट दिए गए.

2007 में राजपक्षे ने चीन के एक कंसोर्टियम के साथ हम्बंतोता बंदरगाह बनाने की 1 बिलियन डॉलर की डील की, फिर चीन को कोलंबो के पास एक विशेष निवेश क्षेत्र दिया गया. श्रीलंका में विद्रोह की शुरुआत भी इसी कारण हुई थी कि चीन के हित विक्रमसिंघे सरकार में नहीं सध पा रहे थे. विक्रमसिंघे ने न सिर्फ भारत से बल्कि पश्चिमी देशों से भी संबंध सुधारने की शुरुआत की.

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ASEAN और इंडो पसिफिक में भारत के लिए कूटनीतिक मौका

मालदीव में चीन समर्थक अब्दुल्लाह यामीन की जगह भारत के पक्षधर इब्राहीम सोली जिन्होंने भारत को अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चुना है और श्रीलंका में विक्रमसिंघे की वापसी ने बीजिंग के लिए एक झटका है और अब खेल में एडवांटेज भारत है. भारत पर निर्भर करता है कि वो श्रीलंका, मालदीव, जैसे देशों को जो भारत की तरफ देख रहे हैं, किस तरह आक्रामक चीन के चंगुल से बचा कर एक मजबूत विकल्प देता है.

अगर भारत को नेतृत्व करना है तो उसे थोडा और सक्त और अपने नेताओ पर पूरा भरोसा करना होगा.

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